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धान की एसआरआई मेडागास्कर विधि

धान की एसआरआई मेडागास्कर विधि
धान की एसआरआई मेडागास्कर विधि

उप संचालक किसान कल्याण तथा कृषि विकास दतिया श्री एसपी शर्मा ने जानकारी देते हुए बताया कि धान की मेडागास्कर पद्धति का प्रयोग करने से सामान्य रोपाई की उपज से कई गुना ज्यादा उपज एसआरआई विधि से धान की रोपाई करने से प्राप्त होती है। इसकी कृषि कार्यमाला इस प्रकार है।

खेत का चुनाव:- इस पद्धति से धान की खेती करने हेतु ऐसे खेतों का चुनाव करें जिसमें जल निकास एवं सिंचाई सफलतापूर्वक की जा सके।
बीज की मात्रा एवं चुनाव:- प्रति हैक्टेयर 5 से 6 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर हाइब्रिड बीज की आवश्यकता होती है जबकि पारंपरिक पद्धति से रोपाई हेतु 30 से 50 किलोग्राम हैक्टेयर बीज लगता है।

रोपणी नर्सरी तैयार करने की विधि:- एसआरआई पद्धति हेतु 300-400 वर्ग फुट या 100 वर्ग मीटर रोपणी की तैयार इस प्रकार की जावे जैसे कि सब्जियों की नर्सरी हेतु क्यारियां बनाई जाती है। नर्सरी के लिये एक मीटर चौड़ी 10 मीटर लंबाई तथा 15 सेमी. की ऊचाई क्यारियां बनायें क्यारियों के दोनो और सिंचाई नाली बनाना आवश्यक है। क्यारियां तैयार होने पर 50 से 60 किलोग्राम नोडप कम्पोस्ट/ वर्मी कम्पोस्ट खाद 10 किलो 12:32:16 एवं 10 किलो यूरिया मिलाकर समतल कर दें। बीजो को 12 घंटे पानी में डुबोकर रखें तत्पश्चात् छयादार जगह में रखकर बीज उपचार कल्चर सूडोमोनास लोरोसेंस 3 ग्राम मात्रा प्रति किलो बीज की दर से उपयोग करें। बीज को बोरों से ढंके ताकि बीज अंकुरित हो जाये तैयार बीज को रोपणी में फैलाकर ऊपर कम्पोस्ट/ गोबर गैस/ वर्मी खाद एवं पैरा से बीजों को पूर्णत: ढंक दें।

पोषक तत्व एवं उर्वरक:- खेत की मिट्टी परीक्षण परिणाम के अनुसार तत्वों के कमी की पूर्ति हेतु जैविक खादों नाडेप खाद, गोबर खाद, वर्मी खाद, बायोगैस की खाद, नीलरहित काई/ अजोला, पीएसबी कल्चर, एजेटोबेक्टर कल्चर एवं रासायनिक खाद का उपयोग किया जा सकता है। जैविक खाद के रूप में 8 से 10 टन प्रति हैक्टेयर की दर से उपलब्ध खाद व पीएसबी तथा एजेटोवेक्टर कल्चर एवं अन्य जैविक उत्पाद का उपयोग किया जाना चाहिए। रासायनिक खाद का उपयोग नत्रजन, स्फुर एवं पोटाश (100:60:30) के अनुपात में किया जाए। स्फुर एवं पोटाश की पूर्ण मात्रा आधार खाद के रूप में उपयोग की जानी चाहिए। यूरिया का उपयोग तीन बार रोपाई के एक सप्ताह बाद, कंसे फूटने के समय एवं गभोट के प्रारंभ काल में की जाना चाहिए। प्रथम यूरिया का उपयोग 30 प्रतिशत, द्वितीय 50 प्रतिशत, तृतीय 30 प्रतिशत मात्रा का उपयोग किया जाना चाहिए।

खेत में पौध रोपण की विधि:- रोपाई समय पर करने से उपज में 10 से लेकर 30 प्रतिशत तक उपज प्राप्त हो सकती है। रोपाई किये जाने वाले खेत को अच्छी तरह जोत कर भुरभुरा कर लेवें तथा भूमि को समतल कर लेना चाहिए। रोपाई कार्य हेतु 8 से 10 दिन के धान के पौधे उपयोगी होते है इन पौधों को जड़ सहित सावधानी पूर्व उखाड़ लें, उखाड़ने के 15 से 30 मिनिट के अंदर ही खेत में पौधे 25×25 सेमी. या 20×20 सेमी. की दूरी पर रोप देने चाहिए। पौधों की रोपाई 2 सेमी. गहरी एवं पौधों की जड़े सीधी होना आवश्यक है। रोपाई किये जाने वाले खेत में पानी भरा होना चाहिए।
जल प्रबंधन:- उचित जल निकासी की व्यवस्था वानस्पितिक वृद्धि के समय भूमि प्रकार के आधार पर सिंचाई की जाये, इसके पीछे मूल उद्देश्य यह है कि पौधों की जड़ों के पास पर्याप्त नमी लगातार बनी रहे। हल्की दरार के बाद प्रथम सिंचाई करें एवं द्वितीय सिंचाई उसके बाद करें।
खरपतवार नियंत्रण:- पहली निंदाई रोपाई के 8 दिन बाद एवं निंदाई 10 दिन के अंतराल में कोनीवीडर तथा हस्तचलित ताउची गुरमा से करायें। कोनीवीडर से की गई निंदाई गुडाई से पौधों की जड़ों पर मिट्टी चढ़ जाती है जिससे पौधों के जड़ वृद्धि से सहायता मिलती है खरपतवार मिट्टी में मिल जाते है, भूमि में खरपतवार नियंत्रण के साथ्ज्ञ हवा का आवागमन भी बढ़ता है, जिससे पौधों की वृद्धि तेजी से होती है।
कीट प्रबंधन:- कीट प्रबंधन प्रारंभ में जैविक विधि एवं उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों से किया जाना उचित होगा। भूमि जनित कीट प्रबंधन हेतु नीम की खली के उपयोग परिणम अच्छे मिले है। खड़ी फसल में गौ-मूत्र, छाछ मट्ठा विधि से तैयार घोल का छिड़काव 15 दिन के अंतराल पर अधिक लाभकारी होता है आवश्यकता पड़ने पर रासायनिक दवाईयों का उपयोग किया जाये।
उपज:- पारंपरिक धान की खेती से 8 से 10 क्विंटल प्रति हैक्टेयर धान उत्पादन के विरूद्ध श्री पद्धति से धान उत्पादन करने से 35 से 55 क्विंटल प्रति हैक्टेयर उत्पादन प्राप्त होता है जो परंपरागत पद्धति की तुलना में 50 से 150 प्रतिशत अधिक है।
अधिक जानकारी हेतु अपने क्षेत्र के ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी/ वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी से सम्पर्क करें एवं कृषि विज्ञान केन्द्र पर तकनीकी मार्गदर्शन हेतु सम्पर्क कर सकते है।

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